Sunday, 2 May 2010

अंतर्द्वंद

सत-असत, पाप- पुन्य, न्याय-अन्याय, राग-विराग से युक्त जब दो भाव एक साथ उत्पन्न होते हैं तो मनुष्य विचार के आधार पर निर्णय नहीं कर पता कि किस पक्ष को स्वीकार करू अथवा किसका त्याग करूं ऐसी स्थिति में उस के भीतर 'हाँ-नहीं' में खींचतान चलती रहती है, वाही अंतर्द्वंद कहलाता है.

10 comments:

  1. बिलकुल सही कहा आपने....

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  2. सच कहा आपने। उस क्षण सिर्फ विवेक साथ देता है।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  3. अंतर्द्वंद की परिस्थिति का सही आंकलन किया है.....लेखक आप ही हैं या कोई और? नाम नहीं दिया है...इस लिए पूछा की आपका ये ब्लॉग मशहूर लेखकों की लिखी हुई बातों पर आधारित है ..

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  4. स्वयं से पूछें , और जो दिल कहे वही करें ! शुभकामनायें !

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  5. संगीता जी शुक्रिया याद दिलाने के लिए. जल्दी में लेखक का नाम भूल गयी थी. इस अभिव्यक्ति के लेखक डा. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा जी हैं.

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  6. बढ़िया परिभाषित किया.

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  7. डा. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा जी के विचार प्रस्तुत करने का आभार.

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  8. BAHUT KHUB

    BADHAI AAP KO IS KE LIYE

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