दुखांत यह नहीं होता कि रात की कटोरी को कोई जिन्दगी के शहद से भर न सके, और वास्तविकता के होंठ कभी उस शहद को चख ना सकें ....दुखांत यह होता है कि जब रात की कटोरी पर से चंद्रमाँ की कलई उतर जाये और उस कटोरी में पड़ी कल्पनाये कसैली हो जाये.
दुखांत ये नहीं होता की आपकी किस्मत से आपके साजन का नाम-पता ना पढ़ा जाये और आपकी उम्र की चिट्ठी सदा रुलती रहे. दुखांत यह होता है कि आप अपने प्रिये को अपनी उम्र कि सारी चिट्ठी लिख लें और आपके पास से आपके प्रिये का नाम पता खो जाये.
दुखांत यह नहीं होता कि जिन्दगी की लम्बी डगर पर समाज के बंधन अपने कांटे बिखेरते रहे..और आपके पैरो में से सारी उम्र लहू बहता रहे. दुखांत यह होता है कि आप लहू लुहान पैरो से एक ऐसी जगह पर खड़े हो जाये जिसके आगे कोई रास्ता आपको बुलावा न दे.
दुखांत यह नहीं होता कि आप अपने इश्क के ठिठुरते शरीर के लिए सारी उम्र गीतों के पैरहन सीते रहें. दुखांत यह होता है कि इन पैरहनो को सीने के लिए आपके विचारो का धागा चूक जाये और आपकी सुई (कलम) का छेद टूट जाये.
....अम्रिता प्रीतम
Tuesday, 4 May 2010
Sunday, 2 May 2010
अंतर्द्वंद
सत-असत, पाप- पुन्य, न्याय-अन्याय, राग-विराग से युक्त जब दो भाव एक साथ उत्पन्न होते हैं तो मनुष्य विचार के आधार पर निर्णय नहीं कर पता कि किस पक्ष को स्वीकार करू अथवा किसका त्याग करूं ऐसी स्थिति में उस के भीतर 'हाँ-नहीं' में खींचतान चलती रहती है, वाही अंतर्द्वंद कहलाता है.
Wednesday, 28 April 2010
मानव हृदय
मानव हृदय एक रहस्यमय वस्तु है. कभी तो वह लाखो की ओर आंख उठा कर नही देखता और कभी कौडियो पर फिसल जाता है. कभी सैकडो निर्दोशो की हत्या पर आह तक नही करता और कभी एक बच्चे को देख कर ही रो पडता है. ....अम्रिता प्रीतम
Monday, 19 April 2010
प्यार का अंत
जनम लेने के बाद मरना पडता है जैसे आकाश में उछाला पत्थर भी जमीन पर गिरता ही है . खून कर के फांसी होती है और चोरी करने पर जेल जाना पडता है , उसी प्रकार प्यार करने पर रोना पडता है. सुना है कि प्यार करने वाले की अंत में दर्द से पीडित होकर छाती फटती है ! ....अम्रिता प्रीतम
Friday, 16 April 2010
कविता से क्या मिलता है ?
कविता से क्या मिलता है ?
एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन
जो दूसरो की दया पर अपना अस्तित्व रखता है ...!
........जय शंकर प्रसाद (नाटक स्कंदगुप्त )
एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन
जो दूसरो की दया पर अपना अस्तित्व रखता है ...!
........जय शंकर प्रसाद (नाटक स्कंदगुप्त )
Saturday, 10 April 2010
नारी मन ...
कभी कभी नारी को जिस चीज के प्रती जितना आकर्षण होता है नारी उस से उतनी ही दूर भागती है. अगर कोई ,प्याला मुह से ना लगा कर दूर फैंक दे तो समझ लो वो बेहद प्यासा है. इतना प्यासा कि तृप्ती की कल्पना से भी घबराता है .
धरम वीर भारती
धरम वीर भारती
Tuesday, 6 April 2010
व्यक्तित्व की पहचान
सोने की पहचान आग से होती है और व्यक्तित्व की पहचान भी तभी होगी जब वो काठीनाईयो से, वेदनाओ से, संघर्षो से खेळे और बाद में विजयी हो . तभी पता चलता है व्यक्तित्व में कितना प्रकाश और बळ है
धरम वीर भारती
धरम वीर भारती
Subscribe to:
Posts (Atom)
