......... धरम वीर भारती
Sunday, 7 March 2010
स्पर्श की ताकत
औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जायें, लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नही करती. वह होठो पर होठो से स्पर्शो के गूढतम अर्थ समझ सकती है. वह आपके स्पर्श में आपकी नसो से चलती हुई भावना को पहचान सकती है. यदि उसे थोडा सा भी अनुभव है और आप उसके हाथ पर हाथ रखते है तो स्पर्श की अनुभूती से ही जान जायेगी कि आप उस से कोई प्रश्न कर रहे है, कोई याचना कर रहे है, सांत्वना दे रहे है या सांत्वना मांग रहे है. क्षमा मांग रहे है या क्षमा दे रहे है. प्यार का प्रारंभ कर रहे है...या समाप्त कर रहे है. स्वागत कर रहे है या विदा दे रहे है. यह पुलक का स्पर्श है या उदासी का चाव और नशे का स्पर्श है या खिन्नता और बेमनी का...!!
Friday, 26 February 2010
विवाह ...
एक विवाह रस्म से होता है, एक विवाह दिल से होता है . रस्म वाला विवाह टूट जाये, मुश्किले आयें, मुसीबते हो पर उन सब को इन्सान आखिर झेल जाता है ...पर दिल के विवाह में कुछः नही बचता !
......अम्रिता प्रीतम
......अम्रिता प्रीतम
Monday, 22 February 2010
बदलाव
जो लोग भावुक होते हैं और सिर्फ रोते हैं, वो रो-धो कर रह जाते हैं. पर जो लोग हसना सीख लेते हैं, वे कभी कभी हस्ते हस्ते उस जिंदगी को बदल भी डालते हैं.
Saturday, 13 February 2010
मन का झुकाव
कब कहा और कैसे हम अपने मन को हार बैठते है, यह खुद हमे नही पता चलता. मालूम तब होता है जब जिसके कदमो पर हमने अपना सिर रख्खा हो और वह झटके से अपने कदम घसीट ले. उस वक्त हमारी नींद टूटती है और तब हम जा कर देखते है कि अरे हमारा सिर तो किसी के कदमो पर रख्खा हुआ था और उसके सहारे हम आराम से सोते हुये सपना देख रहे थे कि हमारा सिर कहीं झुका ही नही.
Tuesday, 2 February 2010
स्त्री सुलभ व्यक्तित्व
जब स्त्री को जीवन की असाधारण कठीनाईयो का सामना करना पडता हैं तो उसके स्त्री सुलभ व्यक्तित्व और चरित्र पर एक प्रकार की कठोरता अंकित हो जाती हैं और उसका भाग्य कुंठित हो जाता हैं, क्युकी यदि वह भावुक और सुकोमल बनी रही तो उसका अंत हो जायेगा और यदि जीवित रही तो उसके अंतस की सुकोमलता सर्वथा नष्ट हो जायेगी. और बाह्य आकृती में परिवर्तन ना होने पर भी उसका हृदय इतना टूट जायेगा की वह हृदय के भाव को कभी व्यक्त नही कर पायेगी.
Wednesday, 20 January 2010
हमारे संस्कार
हम लोग ना उच्च वर्ग के हैं, ना निम्न वर्ग के. हमारे यहा रुडिया, परम्पराये, मर्यादाये भी ऐसी पुरानी और विषाक्त हैं कि कुल मिलाकर हम सब पर ऐसा प्रभाव पडता हैं कि हम यंत्र मात्र रह जाते हैं. हमारे अंदर उदार और उंचे सपने खतम हो जाते हैं. लेकिन ये भी सच हैं कि जब पूरी व्यवस्था बे-इमान हैं तो हमारी इमानदारी इसी में हैं कि इस व्यस्था पर लादी सारी नैतिक विकृती को भी अस्वीकार करे और उस द्वारा आरोपित सारी झूठी मर्यादाओ को भी. लेकिन हम विद्रोह नही कर पाते, सो नतीजा यह कि समझोता करते हैं. मतलब संस्कारो का अंधानुकरण ..! और ऐसे भले आदमी कहलाये जाते हैं..उनकी तारीफ भी होती हैं, परंतु जिंदगी बेहद करुण और भयानक हो जाती हैं. और सबसे बडा दुख यह कि वह अपने जीवन का यह पह्ळू नही समझते और बैल की तरह तमाम उम्र चक्कर लगाते रहते हैं.
Wednesday, 13 January 2010
मन का उद्वेग..
विचारो के
ज़हर भरे कांटे
जब मन में उगने लगते हैं तो..
विषाक्त हो जाता है
पूरा वजूद रूपी पेड..
तब चन्दन की खुशबु देने वाले
भाव भी
ज़हर में डूबने लगते है..!
नहीं रोक पाता
कोई भी विवेक..!
सब्र का घूँट पिला देने पर भी..
नहीं शांत होता
मन का उद्वेग..
और..
बिखर जाती है..
मन की
किर्चन..किर्चन..
और कर जाती है
लहुलुहान मुझे
हर पल..प्रति पल..!!
ज़हर भरे कांटे
जब मन में उगने लगते हैं तो..
विषाक्त हो जाता है
पूरा वजूद रूपी पेड..
तब चन्दन की खुशबु देने वाले
भाव भी
ज़हर में डूबने लगते है..!
नहीं रोक पाता
कोई भी विवेक..!
सब्र का घूँट पिला देने पर भी..
नहीं शांत होता
मन का उद्वेग..
और..
बिखर जाती है..
मन की
किर्चन..किर्चन..
और कर जाती है
लहुलुहान मुझे
हर पल..प्रति पल..!!
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