Monday, 15 August 2011

आया फिर झूमता 15 अगस्त





आया फिर झूमता 15  अगस्त 

ऋतुओं की बाहों में गुनगुनी हवाएं 
रंगने लगीं मोरपंखी चुनरी दिशाएँ 
धूप सोये किशमिशी महुआ के गाँव में,
सोंधापन लिपट गया बरखा के पाँव में  !

                होंसले तिमिर के आज हुए ध्वस्त 
                आया फिर झूमता 15 अगस्त !

उन्नावी उगे पुखराजी आँखों में 
छंद बुने तितली ने केसर की पांखों में 
उग आयीं मेंड़ों पर अलसाई बाहें
कजरारी कोयलिया ग़ज़ल गीत गाएँ !

                संबोधन भावों के हुए अलमस्त 
                आया फिर झूमता 15 अगस्त !

हंसी लगे मुक्तक सी बहती बयार की 
सपनों में झांक गयी गंध एक प्यार की 
सूरज क्यों बादल का कुमकुमी निबंध 
गीत गीत भोर हुआ किरण हुई छंद !

               कुंठा को आशा ने फिर दी शिकस्त 
               आया फिर झूमता 15 अगस्त !

                                                     सुरेश नीरव

Saturday, 13 August 2011

'अग्निपथ'

साथियो नमस्कार !

बहुत दिनों बाद इस ब्लॉग को फिर से शुरू करने की कोशिश जारी है......अब  से मैं भिन्न भिन्न कवियों के कुछ चुने हुए गीत समय समय पर प्रस्तुत करुँगी...आशा है आप अपना सानिध्य बनाये रखेंगे....

तो चलिए सबसे पहले आज प्रस्तुत है हरिवंशराय 'बच्चन' जी की कविता....'अग्निपथ'

Harivansh Rai Bachchan


'अग्निपथ'

अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ ! 
       वृक्ष हों भले खड़े 
       हों घने हों बड़े 
       एक पत्र छाहं भी 
मांग मत ! मांग मत ! मांग मत !

       तू न थकेगा कभी
       तू न थमेगा कभी
       तू न मुड़ेगा कभी
कर शपथ ! कर शपथ ! कर शपथ !

       यह महान दृश्य है
       चल रहा मनुष्य है
       अश्रु - स्वेद- रक्त से 
लथ - पथ ! लथ - पथ ! लथ - पथ !
अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ ! 

Thursday, 28 April 2011

प्रेम अभिव्यक्ति


कई इंसानों में प्रेमाग्नी जितनी प्रबळ होती है उसे दमन करने की शक्ती भी असीम होती है. कई बार प्रेमाग्नी को दबाते-दबाते इन्सान की अवस्था ऐसी हो जाती है मानो वर्षों  का रोगी हो. प्रेमियो को अपनी अभिलाषा पूरी होने की आशा हो या ना हो, परंतु वो मन ही मन अपनी प्रेमिकाओं से मिलने का आनंद उठाते रहते हैं . वे भाव संसार में अपने प्रेम पात्र से वार्तालाप करते हैं. उसे छेड़ते हैं , उससे रूठते हैं . उसे मनाते हैं और इन भावों में उन्हें तृप्ति मिलती है और मन को एक सुखद और रसमय कार्य मिल जाता है. परन्तु कोई शक्ति उन्हें इस भावोद्यान की सैर करने से रोके तो उन अभागों की दया शोचनीय हो जाती है.

अम्रिता प्रीतम

Saturday, 13 November 2010

सोलवां बरस ..

सोलवां बरस इश्वर की साजिश की तरह होता है जो जिंदगी के हर वर्ष में कहीं ना कहीं शामिल होता है. यह बचपन की समाधि तोड़ देता है. और जब कोई समाधि टूटती है तो भटकनें का श्राप उसके पीछे पड़ जाता है...हमारे पीछे भी एक सोचों का शाप पीछे पड़ा है. उम्र के सोलवें साल में हर विश्वास पारंपरिक होता है और इसलिए दकियानूसी भी.  वास्तव में यह वर्ष आयु की सड़क पर लगा हुआ खतरे का चिन्ह होता है (की बीते वर्षों की सपाट सड़क खतम हो गयी है, आगे ऊँची - नीची और भयानक मोडों वाली सड़क शुरू होने वाली है ). इस वर्ष जाना-पहचाना सब कुछ शरीर के वस्त्रों की तरह तंग हो जाता है . होंठ जिंदिगी की प्यास से खुश्क हो जाते हैं, आकाश के तारे जिन्हें सप्त-ऋषियों के आकार में देख कर दूर से प्रणाम करना होता था, पास जा कर छू लेने को जी करता है. इर्द - गिर्द और दूर पास की हवा में इतनी मनाहियाँ और इतने इनकार होते हैं, इतना विरोध की सांसो में आग सुलग उठती है.

अमृता प्रीतम 

Sunday, 12 September 2010

सन्नाटा..

आज मैं सारा दुख अपने ऊपर उतार लेना चाहता हूँ. आज एक ऐसा सन्नाटा है जो न किसी को आने को आमंत्रित करता है और न किसी को जाने से रोकता है.  आज मैं एक ऐसा मैदान हूँ जिस पर की सारी पगडंडियाँ तक मिट गयी हैं. एक ऐसी डाल जिसके सारे फूल झड चुके हों. सारे घोंसले उजड गए हैं. मन में असीम कुंठा और वेदना है .  ऐसा कोई नहीं कि मेरे घावों को छू ले तो मैं आंसुओं में बिखर पडूँ.


धरमवीर भारती.

Tuesday, 20 July 2010

इकरार का फूल

तुम्हारे इकरार को फूल की तरह नहीं पकड़ा था, अपनी मुट्ठी में भींच लिया था. वह कई बरस मेरी मुट्ठी में खिला रहा. पर मांस की हथेली मांस की होती है, यह मिटटी की तरह हमेशा जवान नहीं रहती. इस पर समय की सलवटें पड़ती हैं और जब यह बंजर होने लगती है तो इसमें उगा हर पत्ता मुरझा जाता है. तुम्हारे इकरार का फूल भी मुरझा गया............अमृता प्रीतम

Tuesday, 11 May 2010

बदलाव

जीवन को सुधारने के लिए सिर्फ आर्थिक ढांचा बदल देने भर की जरुरत नहीं है, उसके लिए आदमी का सुधार करना होगा, व्यक्ति का सुधार करना होगा. वर्ना एक भरे - पूरे और वैभवशाली समाज में भी आज के से स्वस्थ और पाशविक वृतियों वाले व्यक्ति रहेंगे तो दुनियाँ ऐसी ही लगेगी जैसे एक खूबसूरत सजा-सजाया महल जिसमें कीड़े और राक्षस रहते हैं.
धर्म वीर भारती