आया फिर झूमता 15 अगस्त
ऋतुओं की बाहों में गुनगुनी हवाएं
रंगने लगीं मोरपंखी चुनरी दिशाएँ
धूप सोये किशमिशी महुआ के गाँव में,
सोंधापन लिपट गया बरखा के पाँव में !
होंसले तिमिर के आज हुए ध्वस्त
आया फिर झूमता 15 अगस्त !
उन्नावी उगे पुखराजी आँखों में
छंद बुने तितली ने केसर की पांखों में
उग आयीं मेंड़ों पर अलसाई बाहें
कजरारी कोयलिया ग़ज़ल गीत गाएँ !
संबोधन भावों के हुए अलमस्त
आया फिर झूमता 15 अगस्त !
हंसी लगे मुक्तक सी बहती बयार की
सपनों में झांक गयी गंध एक प्यार की
सूरज क्यों बादल का कुमकुमी निबंध
गीत गीत भोर हुआ किरण हुई छंद !
कुंठा को आशा ने फिर दी शिकस्त
आया फिर झूमता 15 अगस्त !
सुरेश नीरव