Friday, 8 January 2010

प्यार और बंधन

प्यार जैसी निर्मम वस्तू
क्या भय से
बांधकर रखी जा सकती है ...?
नहीं....!!

वह तो चाहता है..
पूरा विश्वास..
पूरी स्वाधीनता ..
और साथ में पूरी जिम्मेदारी..!

इसमें फैलने की असीमता है..
जिस पर
बंधन रूपी ईटो की दिवार
नहीं बन सकती..!!

Thursday, 24 December 2009

प्रेम aur अंहकार

अंहकार को ध्वंस कर..
पूर्ण श्रद्धा से..
खुद को समर्पण
करने में ही.....
चरम आनंद की
प्राप्ति की जा सकती है..!!
जबकि..
प्रेम अधिकार चाहता है..
प्रेम जो देता है..
उसके बदले में
कुछ ना कुछ पाना चाहता है..!!

Monday, 14 December 2009

त्याग

संपत्तीशाली पुरुष संपत्ती के गुलाम होते हैं. वे कभी सत्य के समर में नही आ सकते ! जो सिपाही गर्दन में सोने की ईट बांध कर लडने चलता हैं, वह कभी नही लड सकता ! उसको तो अपनी ईट की चिंता लगी रहती हैं! जब तक इन्सान ममता का त्याग नही करेगा उसका उद्देश्य कभी पुरा नही होगा !!

Sunday, 29 November 2009

खेळ

खेळ को खेळ की तरह खेलना चाहिये. खेळ इस तरह से खेलो कि निगाह जीत पर रहे, पर हार से घबराये नही, इमान को ना छोडे. जीत कर
............मुन्शी प्रेमचंद

सांय-सांय

अंत समय में जैसे क्षितिज के अथाह विस्तार में उडने वाले पक्षी की बोली प्रती क्षण मद्धम होती जाती है यहा तक कि उसके शब्द का ध्यान मात्र शेष रह जाता है, इसी प्रकार हमारी बोली धीमी होते होते केवळ सांय सांय ही रह जाती है !!


Sunday, 1 November 2009

मूलमन्त्र

मनुष्य अपना जीवन चाहे जैसा बना सकता है ! इसका मूलमन्त्र ये है कि बुरे, क्षुद्र, अश्लील विचार मन मे ना आने पाए, वह बल पूर्वक इन विचरो को हटाता रहे और उत्कृष्ट विचारो तथा भावो से अपने हृदय को पवित्र रखे ! ...... मुंशी प्रेम चंद

नाच

देवताओ का नाच देखना है तो - देखो वृक्ष कि पत्तियो पर निर्मल चन्द्र की किरनो का नाच, तालाब मे कमल के फूल पर पानी की बूँदो का नाच, जंगल मे देखो मोर कैसे पंख फैला नाचता है !
पिशाचो का नाच देखना है तो - देखो दरिद्र पडोसी ज़मिदार के जूते खा कर कैसा नाचता है ! अनाथ बालक क्षुधा से बावले हो कैसे नाचते है ! घरो मे विधवा की आँखो मे वेदना और आसुओ का नाच, मन मे कपट और छल का नाच ! सारा संसार न्रित्यशाला है !! ...... मुंशी प्रेम चंद